ঋগ্বেদ ১০/৮৬/৩ - ধর্ম্মতত্ত্ব

ধর্ম্মতত্ত্ব

ধর্ম বিষয়ে জ্ঞান, ধর্ম গ্রন্থ কি , হিন্দু মুসলমান সম্প্রদায়, ইসলাম খ্রীষ্ট মত বিষয়ে তত্ত্ব ও সনাতন ধর্ম নিয়ে আলোচনা

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স্বাগতম

08 May, 2024

ঋগ্বেদ ১০/৮৬/৩

 বৃষকপায়ি রেবতি সুপুত্র আহু সুস্নুষে।

ঘসত্ত ইন্দ্র উক্ষণঃ প্রিয়ং কাচিৎকরং হবির্বিশ্বস্মাদিন্দ্র উত্তর ||

পদার্থ- (বৃষকপায়ি) সমস্ত সুখ কে মেঘের তুল্য বর্ষনকারী প্রভুর অপার শক্তি! (রেচতি) হে অনেক ঐশ্বর্যের স্বামিনি! (সু-পুত্র)হে উত্তম পুত্র, জীবধারী!(সু-স্নুষে) হে উত্তম সুখপূর্বক বিরাজমান, সুখদায়িনি! (ইন্দ্রঃ) পরম ঐশ্বর্যবান প্রভু (উক্ষণঃ)সেচনকারী মেঘ দ্বারা উৎপন্ন (প্রিয়ম্)প্রীতিকারক (কচিৎকরম্)অনেক সুখ দানকারী (তে হবিঃ) তোমার উত্তম অন্ন সদৃশ  জগতকে (ঘষত্) ভক্ষণ করেন প্রলয়কালে লীন করে নেয় (বিশ্বস্মাত্ উত্তর) পরমঐশ্বর্যবান প্রভু সবার থেকে উপরে। [ঋগ্বেদ- ১০/৮৬/১৩] [ভাষ্যকার-পন্ডিত জয়দেব শর্মা]



पदार्थ

(वृषाकपायि रेवति) हे वृषाकपि-सूर्य की पत्नी रेवती तारा नक्षत्र ! (सुपुत्रे-आत् सुस्नुषे) अच्छे पुत्रोंवाली तथा अच्छी सुपुत्रवधू (ते-उक्षणः) तेरे वीर्यसेचक सूर्य आदियों को (प्रियं काचित्करं हविः) प्रिय सुखकर हवि-ग्रहण करने योग्य भेंट को (इन्द्रः-घसत्) उत्तरध्रुव ग्रहण कर लेता है-मैं उत्तर ध्रुव खगोलरूप पार्श्व में धारण कर लेता हूँ, तू चिन्ता मत कर (मे हि पञ्चदश साकं विंशतिम्) मेरे लिये ही पन्द्रह और साथ बीस अर्थात् पैंतीस (उक्ष्णः पचन्ति) ग्रहों को प्रकृतिक नियम सम्पन्न करते हैं (उत-अहम्-अद्मि) हाँ, मैं उन्हें खगोल में ग्रहण करता हूँ (पीवः) इसलिये मैं प्रवृद्ध हो गया हूँ (मे-उभा कुक्षी-इत् पृणन्ति) मेरे दोनों पार्श्व अर्थात् उत्तर गोलार्ध दक्षिण गोलार्धों को उन ग्रह-उपग्रहों से प्राकृतिक नियम भर देते हैं ॥१३-१४॥

भावार्थ

आकाश में जिन ग्रहों-उपग्रहों की गति नष्ट होती देखी जाती है, वे पैंतीस हैं। आरम्भ सृष्टि में सारे ग्रह-उपग्रह रेवती तारा के अन्तिम भाग पर अवलम्बित थे, वे ईश्वरीय नियम से गति करने लगे, रेवती तारे से पृथक् होते चले गये। विश्व के उत्तर गोलार्ध और दक्षिण गोलार्ध में फैल गये, यह स्थिति सृष्टि के उत्पत्तिकाल की वेद में वर्णित है ॥१३-१४॥

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