ब्राह्मण ग्रंथ क्या हैं - ধর্ম্মতত্ত্ব

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14 July, 2022

ब्राह्मण ग्रंथ क्या हैं

 जब वेदों से वेदों के अर्थ समझने की क्षमता मनुष्यों में समाप्त होने लगी, तो उस समय के महान योगी ऋषियों–मुनियों ने वेदों के अर्थों को समाधि अवस्था में समझ कर ब्राह्मण ग्रंथों का निर्माण किया। वेदों के व्याख्यान ग्रंथ होने के कारण ही इन्हें ब्राह्मण ग्रंथ कहा जाता है। ऋषियों ने इन ब्राह्मण ग्रंथों की भाषा इतनी कठिन रखी कि कोई पवित्रात्मा व योगी व्यक्ति ही इनके अर्थों को समझ सके। इन ब्राह्मण ग्रंथों में सृष्टि विज्ञान की विभिन्न शाखाओं जैसे वर्तमान में हम particle physics, astro physics, neuclear physics, atomic physics, solar plazma physics, cosmology, quantum field theory, string theory आदि नाम देते हैं, उन सबका मिश्रित एवं  उत्कृष्ट स्वरूप इन महान ग्रंथों में मिलता है। इनमें कई ऐसे महान गूढ़ रहस्य हैं जिनके बारे में मॉडर्न साइंस ने कल्पना भी नहीं की है तो वह कहीं पर स्वयं को उलझा हुआ महसूस करता है। वर्तमान विज्ञान से कहीं अधिक विज्ञान इन ब्राह्मण ग्रंथों में विद्यमान है। इनमें कर्मकांड के माध्यम से सृष्टि विज्ञान की व्याख्या की गई है। प्राचीन काल में इस विद्या को सुनने सुनाने से विस्तार किया जाता था। परंतु समय के साथ मनुष्य में तमोगुण बढ़ता गया और समय की मांग को देखते हुए महाभारत से लगभग 2 हजार वर्ष पूर्व ऋषियों ने इन ग्रंथों का संकलन कर के ब्राह्मण ग्रंथों के रूप में लिखा। महाभारत के बाद काफी विनाश होने और विद्वान लोगों को मर जाने के कारण यह विद्या धीरे धीरे लुप्त होती चली गई।  मध्य काल में कुछ आचार्यों ने इन ब्राह्मण ग्रंथों का भाष्य करने का प्रयत्न किया किंतु ऊहा शक्ति तथा योग साधना की कमी और वैज्ञानिकता के अभाव के कारण इन आचार्यों ने इनके रूढ़ अर्थों को ही लिया। ऐसा करने से पशुबलि जैसे अनेकों पापों का उदय हुआ। इन ग्रंथों का ठीक ठीक अर्थ न समझने के कारण हमारे देश ने सारी दुनिया को पशु हिंसा, मांसाहार, अश्लीलता जैसे पापों का प्रचार किया, इस प्रकार जो आर्यावर्त देश कभी संपूर्ण विश्व को विद्या, विज्ञान, चरित्र आदि की शिक्षा देता था वही देश वेदादि शास्त्रों के मिथ्या अर्थों के कारण इन पापों का प्रचारक बन गया। इस ओर सबसे पहले महर्षि दयानंद जी का ध्यान गया और उन्होंने वेदों को समझने के लिए संसार को एक नई दृष्टि देने का प्रयास किया किन्तु समय अभाव के कारण उन्होंने इसे बहुत संक्षिप्त और सांकेतिक भाषा में ही दे पाए, जिसे लोग पूरी तरह से नहीं समझ पाए। जिस शैली को समझ कर वैदिक वैज्ञानिक आचार्य अग्निव्रत जी ने ऐतरेय ब्राह्मण का वैज्ञानिक भाष्य किया और उसके रहस्यों को उजागर किया।

ब्राह्मण ग्रंथ क्या हैं


ब्राह्मण ग्रंथ विज्ञान के ग्रंथ हैं वा इतिहास के 

कुछ विद्वानों को या लगभग सभी विद्वानों को यह भ्रम हो गया है कि ब्राह्मण ग्रंथ इतिहास के ग्रंथ हैं, इसलिए वे इसका ऐतिहासिक अर्थ करने का प्रयास करते हैं किंतु किसी ने यह नहीं विचारा कि ब्राह्मण ग्रंथ वेद के व्याख्यान ग्रन्थ हैं और जब वेदों में इतिहास नहीं है तो उनके व्याख्यान ग्रंथों में इतिहास क्यों होगा। अगर व्याख्यान ग्रन्थ में विभिन्न ऋषि मुनियों का इतिहास बताया गया होगा, नदियों पर्वतों की चर्चा होगी तो वेद में भी ऐसा ही होगा। ऐसा नहीं हो सकता कि वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तक हों और उनके व्याख्यान ग्रंथों में मानवीय इतिहास हो। दुनिया का कोई भी व्यक्ति फिजिक्स के किसी भी सूत्र के व्याख्या में इतिहास नहीं ला सकता, उसी सूत्र की व्याख्या के लिए विज्ञान को और अधिक गहराई से, व्यापकता से व सरलता से समझाएगा। वैसा ही ऋषियों ने भी किया था। किंतु कुछ आर्य विद्वानों को यह भ्रम हुआ कि ये इतिहास के ग्रंथ हैं, वे ऋषि दयानंद जी की बातों को ऐसे पकड़ कर बैठ जाते हैं कि जैसे उनसे आगे कुछ हो ही न, वस्तुतः वे ऋषि दयानंद जी की बातों को समझते भी नहीं। ऋषि दयानंद जी सत्यार्थ प्रकाश के सप्तम समुल्लास में लिखते हैं "ब्राह्मण-पुस्तकों में बहुत-से ऋषि-महर्षियों और राजा-आदि के इतिहास लिखे हैं; और इतिहास जिसका हो, उसके जन्म के पश्चात् लिखा जाता है, वह ग्रन्थ भी उनके जन्मे पश्चात् होता है। इससे वे लोग ब्राह्मण ग्रंथों में इतिहास मान लेते हैं", किंतु ऋषि की बातों को समझते नहीं। ऋषि दयानंद जी सत्यार्थ प्रकाश के 11वें समुल्लास में ब्राह्मण ग्रंथों में कितना इतिहास है इस विषय में प्रकाश डालते हुए तैत्तरीय आरण्यक व आश्वलायन गृह्यसूत्र का प्रमाण दे कर व्याख्या में ब्राह्मण ग्रंथों के अंदर इतिहास के विषय लिखते हैं, "जैसे जनक और याज्ञवल्क्य का संवाद" अर्थात् ऋषि दयानंद जी के अनुसार ब्राह्मण ग्रंथों में ऋषियों का नाम, उनका संवाद, अमुख ऋषि का यह मत था, मात्र इतना ही इतिहास है। आचार्य अग्निव्रत जी ने ऐतरेय ब्राह्मण ग्रंथ का भाष्य किया है, उसमें कई ऋषियों की चर्चा आती है कि इस ऋषि का यह मत है, उस ऋषि का यह मत है, जैसे साइंस की पुस्तकों में वैज्ञानिकों का नाम आ जाता है, वह कहां जन्मा यह भी आ जाता है NCERT की पुस्तकों में थोड़ा परिचय भी आ जाता है किंतु ब्राह्मण ग्रंथों में तो ऋषियों का परिचय भी नहीं है, नाम है और कहीं उनका गोत्र है, इससे अधिक नहीं है। निरुक्त वेद को समझने के लिए एक बहुत बड़ा आधार ग्रंथ माना जाता है और इस ग्रंथ का आधार ब्राह्मण ग्रंथ ही हैं, निरुक्त में तो महर्षि यास्य जी लिखते हैं, "इति ब्राह्मणम्। इति ह विज्ञायते।" महर्षि यास्क जी के इस वचन से स्पष्ट है कि ब्राह्मण ग्रंथ विज्ञान के ग्रंथ हैं।

प्रश्न - वेद तो सब सत्य विद्याओं की पुस्तक है तो उसके व्याख्यान ग्रन्थ में सिर्फ पदार्थ विज्ञान ही क्यों है?

उत्तर - अन्य विषयों के लिए अन्य ग्रंथ भी हैं, किंतु ब्राह्मण ग्रंथ सृष्टि विद्या की व्याख्या करने वाले ग्रंथ हैं, ब्राह्मण ग्रंथों में अन्य विषय न होने का कारण यह है कि जब लोग सृष्टि विद्या को पूरी तरह से समझ जायेंगे तो अन्य विषयों को भी जान लेंगे। वेद के सभी मंत्र पदार्थ हैं, और इस कारण उनका मुख्य अर्थ आधिदैविक ही होगा, अतः ब्राह्मण ग्रंथों में आधिदैविक अर्थ की ही व्याख्या की गई है।

प्रश्न - आप तो ब्राह्मण ग्रंथों को विज्ञान का ग्रंथ कह रहे हैं किन्तु ऋषि दयानंद जी ने अनेकत्र ब्राह्मण ग्रंथों का आध्यात्मिक वा आधिभौतिक अर्थ भी किया है, अतः आपकी मान्यता ऋषि विरुद्ध प्रतीत होती है?

उत्तर - ब्राह्मण ग्रंथों की कुछ कंडिकाओं का एक से अधिक प्रकार का अर्थ भी होता है, और ऋषि ने प्रकरण अनुकूल वहां पर आध्यात्मिक वा आधिभौतिक अर्थ लिया, इससे ऋषि के विरुद्ध हमारी कोई मान्यता सिद्ध नहीं होती।

प्रश्न - क्या ब्राह्मण ग्रंथों में उपासना भी है?

उत्तर - आचार्य अग्निव्रत जी इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं कि ब्राह्मण ग्रंथों में उपासना कहीं आई हो यह अभी तक उनके जानकारी में नहीं आई। और आगे कहते हैं कि उपासना तभी होगी जब ब्रह्म को जानेंगे और जब ब्रह्म को जान लेंगे तो उपासना करने में आनंद भी आएगा। एक व्यक्ति साधना करता है और उसको यह जानकारी है कि ईश्वर कैसा है, शरीर रचना कैसी है, सृष्टि कैसी है, तो वह ज्यादा उपासना कर पायेगा तथा उसका मन भी लगेगा और उसकी ईश्वर के प्रति श्रद्धा भी होगी। ब्राह्मण ग्रंथों से यह जानकारी हो जाएगी उसके पश्चात उपासना स्वयं कर लेगा और जिस समय में ब्राह्मण ग्रंथ लिखे गए उस समय तो सब उपासना करते ही थे। Physical science को बचाने के उद्देश्य से और इसको इस प्रकार लिखा गया कि केवल योगी व्यक्ति ही इसे समझ सके, यह उद्देश्य था ब्राह्मण ग्रंथों का।

प्रश्न - क्या ब्राह्मण ग्रंथों में कर्मकांड है?

उत्तर - ब्राह्मण ग्रंथ कर्मकांड की शैली में लिखे गए हैं। अश्वमेध, सोम याग आदि सारे यज्ञों का प्रारंभ सृष्टि को समझाने के लिए ही हुआ था। उनकी प्रक्रियाओं से सृष्टि जानी जाती थी। बाद में उनकी प्रक्रिया तो सबने रट ली और यज्ञ भी होते रहे किंतु वे प्रक्रिया क्यों कर रहे हैं उनसे सृष्टि के बारे में क्या जानकारी मिलती है यह विद्या लुप्त हो गई। ब्राह्मण ग्रंथों में यही विद्या बताई है।

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