যজুর্বেদ ১৬/১৭ - ধর্ম্মতত্ত্ব

ধর্ম্মতত্ত্ব

ধর্ম বিষয়ে জ্ঞান, ধর্ম গ্রন্থ কি , হিন্দু মুসলমান সম্প্রদায়, ইসলাম খ্রীষ্ট মত বিষয়ে তত্ত্ব ও সনাতন ধর্ম নিয়ে আলোচনা

धर्म मानव मात्र का एक है, मानवों के धर्म अलग अलग नहीं होते-Theology

সাম্প্রতিক প্রবন্ধ

Post Top Ad

স্বাগতম

14 July, 2022

যজুর্বেদ ১৬/১৭

 যজুর্বেদ ১৬।১৭ "...... নমো বৃক্ষেভ্যো হরিকেশেভ্যেঃ পশূনাম্ পতয়ে নমঃ....।।"

ভাবার্থঃ - হে হরিকেশ বৃক্ষ! তুমি পশুপতি, এইজন্য আমরা তোমার আদর.. অর্থাৎ পালন করি। উদ্ভিদের প্রতি আদরের কারণ হল এটাই যে সমস্ত মানুষ আর পশু বৃক্ষের জন্যই জীবিত রয়েছে। উদ্ভিদ যদি না থাকে তবে না মানুষ থাকতে পারবে আর না কোনো পশু, এইজন্য খেতির পাশাপাশি বন-জঙ্গল করা আর জঙ্গলের রক্ষা করাও অত্যন্ত আবশ্যক। মানুষের উচিত শ্রেষ্ঠদের সৎকার করা, ক্ষুধার্ত কে অন্য দেওয়া, পশুদের রক্ষা করা, চোর-ডাকাত আদি থেকে সকলকে রক্ষা করা, চক্রবর্ত্তী রাজ্যের শিক্ষা দেওয়া, যজ্ঞপবীত ধারন করে শরীরাদির পুষ্টির সাথে প্রসন্ন থাকা।।

যজুর্বেদ ১৬/১৭
नमो॒ हिर॑ण्यबाहवे सेना॒न्ये᳖ दि॒शां च॒ पत॑ये॒ नमो॒ नमो॑ वृ॒क्षेभ्यो॒ हरि॑केशेभ्यः पशू॒नां पत॑ये॒ नमो॒ नमः॑ श॒ष्पिञ्ज॑राय॒ त्विषी॑मते पथी॒नां पत॑ये॒ नमो॒ नमो॒ हरि॑केशायोपवी॒तिने॑ पु॒ष्टानां॒ पत॑ये॒ नमः॑ ॥[যজু০ ১৬।১৭]

अन्वय: (नमः) वज्रः (हिरण्यबाहवे) हिरण्यं ज्योतिरिव तीव्रतेजस्कौ बाहू यस्य तस्मै (सेनान्ये) यः सेनां नयति शिक्षां प्रापयति तस्मै (दिशाम्) सर्वासु दिक्षु स्थितानां राज्यप्रदेशानाम् (च) (पतये) पालकाय। अत्र षष्ठीयुक्तश्छन्दसि वा [अष्टा०१.४.९] इति घिसंज्ञा। (नमः) अन्नादिकम् (नमः) वज्रादिशस्त्रसमूहः (वृक्षेभ्यः) आम्रादिभ्यः (हरिकेशेभ्यः) हरयो हरणशीलाः सूर्यरश्मयो येषु तेभ्यः (पशूनाम्) गवादीनाम् (पतये) रक्षकाय (नमः) सत्करणम् (नमः) (शष्पिञ्जराय) शडुत्प्लुतं पिञ्जरं बन्धनं येन तस्मै (त्विषीमते) बह्व्यस्त्विषयो न्यायदीप्तयो विद्यन्ते यस्य तस्मै। शरादीनां च [अष्टा०६.३.१२०] इति दीर्घः। (पथीनाम्) मार्गे गन्तॄणाम् (पतये) पालकाय (नमः) सत्करणमन्नं च (नमः) अन्नादिकम् (हरिकेशाय) हरिता केशा यस्य तस्मै (उपवीतिने) प्रशस्तमुपवीतं यज्ञोपवीतं विद्यते यस्य तस्मै (पुष्टानाम्) अरोगाणाम् (पतये) रक्षकाय (नमः) सत्कारः ॥-स्वामी दयानन्द सरस्वती

पदार्थान्वयभाषाः -हे शत्रुताड़क सेनाधीश ! (हिरण्यबाहवे) ज्योति के समान तीव्र तेजयुक्त भुजावाले (सेनान्ये) सेना के शिक्षक तेरे लिये (नमः) वज्र प्राप्त हो (च) और (दिशाम्) सर्व दिशाओं के राज्य भागों के (पतये) रक्षक तेरे लिये (नमः) अन्नादि पदार्थ मिले (हरिकेशेभ्यः) जिन में हरणशील सूर्य की किरण प्राप्त हों ऐसे (वृक्षेभ्यः) आम्रादि वृक्षों को काटने के लिये (नमः) वज्रादि शस्त्रों को ग्रहण कर (पशूनाम्) गौ आदि पशुओं के (पतये) रक्षक तेरे लिये (नमः) सत्कार प्राप्त हो (शष्पिञ्जराय) विषयादि के बन्धनों से पृथक् (त्विषीमते) बहुत न्याय के प्रकाशों से युक्त तेरे लिये (नमः) नमस्कार और अन्न हो (पथीनाम्) मार्ग में चलने हारों के (पतये) रक्षक तेरे लिये (नमः) आदर प्राप्त हो (हरिकेशाय) हरे केशोंवाले (उपवीतिने) सुन्दर यज्ञोपवीत से युक्त तेरे लिये (नमः) अन्नादि पदार्थ प्राप्त हों और (पुष्टानाम्) नीरोगी पुरुषों की (पतये) रक्षा करने हारे के लिये (नमः) नमस्कार प्राप्त हो ॥ भावार्थभाषाः -मनुष्यों को चाहिये कि श्रेष्ठों के सत्कार, भूख से पीड़ितों को अन्न देने, चक्रवर्ति राज्य की शिक्षा, पशुओं की रक्षा, जाने-आनेवालों को डाकू और चोर आदि से बचाने, यज्ञोपवीत के धारण करने और शरीरादि की पुष्टि के साथ प्रसन्न रहें ॥

No comments:

Post a Comment

ধন্যবাদ

বৈশিষ্ট্যযুক্ত পোস্ট

গীতা সারাংশ

  বেদ বিহিত কর্মই ধর্ম। স্থিতপ্রজ্ঞ ধর্মানুরূপ কর্ম কর।  কর্মে তুমি স্বতন্ত্র ফল ভোগে অর্থাৎ ঐশ্বরিক বিধানে পরতন্ত্র॥ সর্বব্যাপক ন্যায়কারী প...

Post Top Ad

ধন্যবাদ