অথর্ববেদ ১/১/২ - ধর্ম্মতত্ত্ব

ধর্ম্মতত্ত্ব

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धर्म मानव मात्र का एक है, मानवों के धर्म अलग अलग नहीं होते-Theology

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29 June, 2021

অথর্ববেদ ১/১/২

                                                                ঋষিঃ-অথর্বা।। দেবতা-বাচস্পতিঃ।। ছন্দঃ-অনুষ্টুপ্।।

পুনরেহি বাচস্পতে দেবেন মনসা সহ।

বসোষ্পতে নিরময় ময্যেবাস্তু ময়ি স্রুতম্।। 
पुन॒रेहि॑ वाचस्पते दे॒वेन॒ मन॑सा स॒ह। वसो॑ष्पते॒ नि र॑मय॒ मय्ये॒वास्तु॒ मयि॑ श्रु॒तम् ॥

মন্ত্রার্থঃ (বাচস্পতে) হে বাণীর স্বামী পরমেশ্বর! তুমি (পুনঃ) বারবার (এহি) এসো (বসোঃ পতে) হে শ্রেষ্ঠ গুণের রক্ষক! (দেবেন) প্রকাশময় (মনসা সহ) মনের সাধ (নি) নিরন্তর (রময়) [আমাকে] রমন করা, (ময়ি) আমার মধ্যে বর্ত্তমান (শ্রুতম্) বেদ বিজ্ঞান (ময়ি) আমার মধ্যে (এব) ই (অস্তু) থাকে।। 
ভাবার্থঃ মনুষ্য প্রযত্ন পূর্বক (বাচস্পতি) পরম গুরু পরমেশ্বরের ধ্যান নিরন্তর করতে থাকে আর সবসময় স্মরণের সাথে বেদ বিজ্ঞান হইতে নিজের হৃদয়কে শুদ্ধ করে সদা সুখ ভোগ করেন।।
অথর্ববেদ ১/১/২


पदार्थान्वयभाषाः -(वाचस्पते) हे वाणी के स्वामी परमेश्वर ! तू (पुनः) वारंवार (एहि) आ। (वसोः पते) हे श्रेष्ठ गुण के रक्षक ! (देवेन) प्रकाशमय (मनसा सह) मन के साथ (नि) निरन्तर (रमय) [मुझे] रमण करा, (मयि) मुझमें वर्त्तमान (श्रुतम्) वेदविज्ञान (मयि) मुझमें (एव) ही (अस्तु) रहे ॥ भावार्थभाषाः -मनुष्य प्रयत्नपूर्वक (वाचस्पति) परमगुरु परमेश्वर का ध्यान निरन्तर करता रहे और पूरे स्मरण के साथ वेदविज्ञान से अपने हृदय को शुद्ध करके सदा सुख भोगे ॥ टिप्पणी:टिप्पणी−भगवान् यास्कमुनि ने (वाचस्पति) का अर्थवाचः पाता वा पालयिता वा−अर्थात् वाणी की रक्षा करनेवाला या करानेवाला किया है−निरु० १०।१७। और निरु० १०।१८। में उदाहरणरूप से इस मन्त्र का पाठ इस प्रकार है। पुन॒रेहि॑ वाचस्पते दे॒वेन॒ मनसा॑ स॒ह। वसो॑ष्पते॒ निरा॑मय॒ मय्ये॒व त॒न्वं  मम॑ ॥१॥ हे वाणी के स्वामी ! तू बारम्बार आ। हे धन वा अन्न के रक्षक ! प्रकाशमय मन के साथ मुझमें ही मेरे शरीर को नियमपूर्वक रमण करा ॥ मन की उत्तम शक्तियों के बढ़ाने के लिये (यज्जाग्र॑तो दू॒रमु॒दैति॒ दैव॒म्) इत्यादि यजुर्वेद अ० ३४ म० १-६ भी हृदयस्थ करने चाहिएँ ॥ २−पुनः। पनाय्यते स्तूयत इति। पन स्तुतौ−अर् अकारस्य उत्वं पृषोदरादित्वात्। अवधारणेन। वारंवारम्। आ+इहि। आ+इण् गतौ लोट्। आगच्छ। वाचः+पते। मं० १। हे वाण्याः स्वामिन्, हे ब्रह्मन्। वाचस्पतिर्वाचः पाता वा पालयिता वा−नि० १०।१७। देवेन। नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः। पा० ३।१।१३४। इति दिवु क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिमोदमदस्वप्नकान्ति- गतिषु−पचाद्यच्। दिव्येन, द्योतकेन, प्रकाशमयेन। मनसा। सर्वधातुभ्योऽसुन्। उ० ४।१८९। इति मन ज्ञाने असुन्। चित्तेन, अन्तःकरणेन। वसोः। शृस्वृस्निहीति। उ० १।१०। इति वस निवासे आच्छादने−उ प्रत्ययः। श्वसो वसीयश्श्रेयसः। पा० ५।४।८०। अत्र वसु शब्दः प्रशस्तवाची। श्रेष्ठगुणस्य। अथवा छन्दसि वसुनः धनस्य। पते। मं० १। पालयितः, स्वामिन्। वसोष्पते। षष्ठ्याः पतिपुत्र०। पा० ८।३।५३। इति विसर्गस्य सत्त्वम्। आदेशप्रत्ययोः। पा० ८।३।५९। इति षत्वम्। नि। नियमेन, नितराम्। रमय। हेतुमति च। पा० ३।१।२६। इति रमु क्रीडायाम्−णिच्−लोट्। णिचि वृद्धिप्राप्तौ। मितां ह्रस्वः। पा० ६।४।९२। इति मित्त्वाद् उपधाह्रस्वः। क्रीडय, आनन्दय माम्। मयि। ममात्मनि वर्त्तमानम्। श्रुतम्। श्रूयते स्म यदिति। श्रु श्रुतौ−क्त। अधीतम्, वेदशास्त्रम् ॥-पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

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