সীসেন তন্ত্রম্ মনসা মনীষিণऽঊর্ণাসূত্রেণ কবয়ো বয়ন্তি।
অশ্বিনা য়জ্ঞꣳ সবিতা সরস্বতীন্দ্রস্য রূপম্ বরুণো ভিষজ্যন্।।
ভাবার্থঃ যেমন বিদ্বানেরা অনেক ধাতু ও সাধন বিশেষ দ্বারা বস্ত্রাদি তৈরী করে কুটুম্বদিগকে পালন করেন এবং পদার্থের সংমিশ্রণে যজ্ঞাদির ঔষধিরুপ পদার্থ দ্বারা পরিবেশে সূরক্ষা প্রদান করেন, শিল্প-ক্রিয়াদির মাধ্যমে প্রয়োজন সিদ্ধ করেন তেমন অন্যেরাও যেন করে। মন্ত্র টি বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার যুক্ত।।
पदार्थान्वयभाषाः -हे मनुष्यो ! जैसे (कवयः) विद्वान् (मनीषिणः) बुद्धिमान् लोग (सीसेन) सीसे के पात्र के समान कोमल (ऊर्णासूत्रेण) ऊन के सूत्र से कम्बल के तुल्य प्रयोजनसाधक (मनसा) अन्तःकरण से (तन्त्रम्) कुटुम्ब के धारण के समान यन्त्रकलाओं को (वयन्ति) रचते हैं, जैसे (सविता) अनेक विद्या-व्यवहारों में प्रेरणा करनेहारा पुरुष और (सरस्वती) उत्तम विद्यायुक्त स्त्री तथा (अश्विना) विद्याओं में व्याप्त पढ़ाने और उपदेश करनेहारे दो पुरुष (यज्ञम्) संगति=मेल करने योग्य व्यवहार को करते हैं, जैसे (भिषज्यन्) चिकित्सा की इच्छा करता हुआ (वरुणः) श्रेष्ठ पुरुष (इन्द्रस्य) परम ऐश्वर्य के (रूपम्) स्वरूप का विधान करता है, वैसे तुम भी किया करो ॥
अन्वय:
(सीसेन) सीसकधातुपात्रेणेव (तन्त्रम्) कुटुम्बधारणमिव तन्त्रकलानिर्माणम् (मनसा) अन्तःकरणेन (मनीषिणः) मेधाविनः (ऊर्णासूत्रेण) ऊर्णाकम्बलेनेव (कवयः) विद्वांसः (वयन्ति) निर्मिमते (अश्विना) विद्याव्याप्तावध्यापकोपदेशकौ (यज्ञम्) सङ्गन्तुमर्हं व्यवहारम् (सविता) विद्याव्यवहारेषु प्रेरकः (सरस्वती) प्रशस्तविज्ञानयुक्ता स्त्री (इन्द्रस्य) परमैश्वर्यस्य (रूपम्) स्वरूपम् (वरुणः) श्रेष्ठः (भिषज्यन्) चिकित्सुः सन् ॥
भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् लोग अनेक धातु और साधन विशेषों से वस्त्रादि को बना के अपने कुटुम्ब का पालन करते हैं तथा पदार्थों के मेलरूप यज्ञ को कर पथ्य ओषधिरूप पदार्थों को देके रोगों से छुड़ाते और शिल्प-क्रियाओं से प्रयोजनों को सिद्ध करते हैं, वैसे अन्य लोग भी किया करें ॥-स्वामी दयानन्द सरस्वती

No comments:
Post a Comment
ধন্যবাদ