वेदा॒हमे॒तं पुरु॑षं म॒हान्त॑मादि॒त्यव॑र्णं॒ तम॑सः प॒रस्ता॑त्।
तमे॒व वि॑दि॒त्वाति॑ मृ॒त्युमे॑ति॒ नान्यः पन्था॑ विद्य॒तेऽय॑नाय॥
বেদাহমেতম্ পুরুষম্ মহান্তমাদিত্যবর্ণম্ তমসঃ পরস্তাত্।
তমেব বিদিত্বাতি মৃত্যুমেতি নান্যঃ পন্থা বিদ্যতেऽয়নায়।। (য়জুঃ ৩১|১৮)
পদার্থঃ- (বেদ) জানিয়াছি (অহম্) আমি (এতম্) এই (পুরুষম্ ) ব্যাপক পুরুষকে (মহাস্তম্) মহান্ (আদিত্য বর্ণম্) জ্যোতিস্বরূপ (তমসঃ) অন্ধকারের (পরস্তাৎ) পরপারে (তম্) তাহাকে (এব) ই বিদিত্বা জানিয়া (অতি এতি) পার হয় (মৃত্যুম্) মৃত্যুকে (ন) না (অন্যঃ) অন্য (পন্থা) পথ (বিদ্যতে) আছে (অয়নায় পরমপদ প্রাপ্তির জন্য।
पदार्थ -
हे जिज्ञासु पुरुष! (अहम्) मैं जिस (एतम्) इस पूर्वोक्त (महान्तम्) बड़े-बड़े गुणों से युक्त (आदित्यवर्णम्) सूर्य के तुल्य प्रकाशस्वरूप (तमसः) अन्धकार वा अज्ञान से (परस्तात्) पृथक् वर्त्तमान (पुरुषम्) स्वस्वरूप से सर्वत्र पूर्ण परमात्मा को (वेद) जानता हूं (तम्, एव) उसी को (विदित्वा) जान के आप (मृत्युम्) दुःखदायी मरण को (अति, एति) उल्लङ्घन कर जाते हो, किन्तु (अन्यः) इससे भिन्न (पन्थाः) मार्ग (अयनाय) अभीष्ट स्थान मोक्ष के लिये (न, विद्यते) नहीं विद्यमान है॥
भावार्थ - यदि मनुष्य इस लोक-परलोक के सुखों की इच्छा करें तो सबसे अति बड़े स्वयंप्रकाश और आनन्दस्वरूप अज्ञान के लेश से पृथक् वर्त्तमान परमात्मा को जान के ही मरणादि अथाह दुःखसागर से पृथक् हो सकते हैं, यही सुखदायी मार्ग है, इससे भिन्न कोई भी मनुष्यों की मुक्ति का मार्ग नहीं है॥

No comments:
Post a Comment
ধন্যবাদ