ঋগ্বেদ ১/১৪/৯ - ধর্ম্মতত্ত্ব

ধর্ম্মতত্ত্ব

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12 August, 2022

ঋগ্বেদ ১/১৪/৯

 

आकीं॒ सूर्य॑स्य रोच॒नाद्विश्वा॑न्दे॒वाँ उ॑ष॒र्बुधः॑। विप्रो॒ होते॒ह व॑क्षति॥

पदार्थ -
जो (होता) होम में छोड़ने योग्य वस्तुओं का देने-लेनेवाला (विप्रः) बुद्धिमान् विद्वान् पुरुष है, वही (सूर्य्यस्य) चराचर के आत्मा परमेश्वर वा सूर्य्यलोक के (रोचनात्) प्रकाश से (इह) इस जन्म वा लोक में (उषर्बुधः) प्रातःकाल को प्राप्त होकर सुखों को चितानेवाले (विश्वान्) जो कि समस्त (देवान्) श्रेष्ठ भोगों को (वक्षति) प्राप्त होता वा कराता है, वही सब विद्याओं को प्राप्त होके आनन्दयुक्त होता है॥९॥

भावार्थ - इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। यदि ईश्वर इन पदार्थों को उत्पन्न नहीं करता, तो कोई पुरुष उपकार लेने को समर्थ भी नहीं हो सकता, और जब मनुष्य निद्रा में स्थित होते हैं, तब कोई मनुष्य किसी भोग करने योग्य पदार्थ को प्राप्त नहीं हो सकता किन्तु जाग्रत् अवस्था को प्राप्त होकर उनके भोग करने को समर्थ होता है। इससे इस मन्त्र में उषर्बुधः इस पद का उच्चारण किया है। संसार के इन पदार्थों से बुद्धिमान् मनुष्य ही क्रिया की सिद्धि को कर सकता है, अन्य कोई नहीं॥

ও৩ম্ আকীং সূর্যস্য রোচনাদ্বিশ্বান্দেবাং উষর্বুধঃ।

বিপ্রো হোতেহ বক্ষতি।।[ঋ০ ১।১।২৭।৩]

এই মন্ত্রটি শ্লেষালঙ্কার যুক্ত। মন্ত্রে "উষর্বুধঃ" পদ উচ্চারিত মাধ্যমে সংসারের পদার্থের দ্বারা বুদ্ধিমান মনুষ্যই কর্ম সিদ্ধি করতে পারেন, অন্য কেউ নয় বলা হয়েছে। ঈশ্বর সকল পদার্থ গুলি উৎপন্ন না করলে কোন মানুষ্যই উপকার নিতে সমর্থ হন না।

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