हि॒र॒ण्मये॑न॒ पात्रे॑ण स॒त्यस्यापि॑हितं॒ मुखम्।
यो॒ऽसावा॑दि॒त्ये पु॑रुषः॒ सोऽसाव॒हम्। ओ३म् खं ब्रह्म॑॥
হিরণ্মযেন পাত্রেণ সত্যস্যাপিহিতং মুখম্ ৷
যোऽসাবাদিত্যে পুরুষঃ সোऽসাবহম ৷ ও৩ম্ খং ব্রহ্ম||
ভাবার্থঃ- সব মনুষ্যের প্রতি ঈশ্বর উপদেশ করছেন যে, হে মনুষ্য! আমি যেমন এখানে রয়েছি তেমন অন্যত্র সূর্য্যাদি লোকেও রয়েছি, সর্বত্র পরিপূর্ণ আকাশের সাদৃশ্য ব্যাপক আমার চেয়ে শ্রেষ্ঠ কেউ নেই৷
আমার সুলক্ষণ সম্পন্ন পুত্র তুল্য প্রাণের চেয়ে প্রিয় আমার নিজ নাম 'ও৩ম্' যিনি প্রেম এবং সত্যাচরণ ভাবে আমার শরণাপন্ন হন আমি তাকে অন্তর্যামী রূপে অবিদ্যার বিনাশ করে ,তার আত্মাকে প্রকাশিত করে শুভ,গুণ,কর্ম স্বভাবকারী করে, সত্যস্বরূপের আবরণ স্থির পূর্বক যোগের মাধ্যমে শুদ্ধ বিজ্ঞান প্রদান করি এবং সব দুঃখ থেকে মুক্ত করে মোক্ষসুখ প্রাপ্ত করিয়ে থাকি ৷
पदार्थ -
हे मनुष्यो! जिस (हिरण्मयेन) ज्योतिःस्वरूप (पात्रेण) रक्षक मुझसे (सत्यस्य) अविनाशी यथार्थ कारण के (अपिहितम्) आच्छादित (मुखम्) मुख के तुल्य उत्तम अङ्ग का प्रकाश किया जाता (यः) जो (असौ) वह (आदित्ये) प्राण वा सूर्य्यमण्डल में (पुरुषः) पूर्ण परमात्मा है (सः) वह (असौ) परोक्षरूप (अहम्) मैं (खम्) आकाश के तुल्य व्यापक (ब्रह्म) सबसे गुण, कर्म और स्वरूप करके अधिक हूं (ओ३म्) सबका रक्षक जो मैं उसका ‘ओ३म्’ ऐसा नाम जानो॥
हे मनुष्यो! जिस (हिरण्मयेन) ज्योतिःस्वरूप (पात्रेण) रक्षक मुझसे (सत्यस्य) अविनाशी यथार्थ कारण के (अपिहितम्) आच्छादित (मुखम्) मुख के तुल्य उत्तम अङ्ग का प्रकाश किया जाता (यः) जो (असौ) वह (आदित्ये) प्राण वा सूर्य्यमण्डल में (पुरुषः) पूर्ण परमात्मा है (सः) वह (असौ) परोक्षरूप (अहम्) मैं (खम्) आकाश के तुल्य व्यापक (ब्रह्म) सबसे गुण, कर्म और स्वरूप करके अधिक हूं (ओ३म्) सबका रक्षक जो मैं उसका ‘ओ३म्’ ऐसा नाम जानो॥
भावार्थ - सब मनुष्यों के प्रति ईश्वर उपदेश करता है कि हे मनुष्यो! जो मैं यहां हूं, वही अन्यत्र सूर्य्यादि लोक में, जो अन्यस्थान सूर्य्यादि लोक में हूं वही यहां हूं, सर्वत्र परिपूर्ण आकाश के तुल्य व्यापक मुझसे भिन्न कोई बड़ा नहीं, मैं ही सबसे बड़ा हूं। मेरे सुलक्षणों के युक्त पुत्र के तुल्य प्राणों से प्यारा मेरा निज नाम ‘ओ३म्’ यह है। जो मेरा प्रेम और सत्याचरण भाव से शरण लेता, उसकी अन्तर्यामीरूप से मैं अविद्या का विनाश, उसके आत्मा को प्रकाशित करके शुभ, गुण, कर्म, स्वभाववाला कर सत्यस्वरूप का आवरण स्थिर कर योग से हुए शुद्ध विज्ञान को दे और सब दुःखों से अलग करके मोक्षसुख को प्राप्त कराता हूं। इति॥
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