यजुर्वेद 38/26 - ধর্ম্মতত্ত্ব

ধর্ম্মতত্ত্ব

ধর্ম বিষয়ে জ্ঞান, ধর্ম গ্রন্থ কি , হিন্দু মুসলমান সম্প্রদায়, ইসলাম খ্রীষ্ট মত বিষয়ে তত্ত্ব ও সনাতন ধর্ম নিয়ে আলোচনা

धर्म मानव मात्र का एक है, मानवों के धर्म अलग अलग नहीं होते-Theology

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স্বাগতম

08 August, 2020

यजुर्वेद 38/26

 ऋषि: - दीर्घतमा ऋषिः

देवता - इन्द्रो देवता

छन्दः - स्वराट् पङ्क्तिः

स्वरः - पञ्चमः

याव॑ती॒ द्यावा॑पृथि॒वी याव॑च्च स॒प्त सिन्ध॑वो वितस्थि॒रे।ताव॑न्तमिन्द्र ते॒ ग्रह॑मू॒र्जा गृ॑ह्णा॒म्यक्षि॑तं॒ मयि॑ गृह्णा॒म्यक्षि॑तम्॥२६॥

स्वर सहित पद पाठ

याव॑ती॒ऽइति॒ याव॑ती। द्यावा॑पृथि॒वीऽइति॒ द्यावा॑पृथि॒वी। याव॑त्। च॒। स॒प्त। सिन्ध॑वः। वि॒त॒स्थि॒रे इति॑ विऽतस्थि॒रे ॥ ताव॑न्तम्। इ॒न्द्र॒। ते॒। ग्र॑हम्। ऊ॒र्जा। गृ॒ह्णा॒मि॒। अक्षि॑तम्। मयि॑। गृ॒ह्णा॒मि॒। अक्षि॑तम् ॥२६ ॥


स्वर रहित मन्त्र

यावती द्यावापृथिवी यावच्च सप्त सिन्धवो वितस्थिरे । तवन्तमिन्द्र ते ग्रहमूर्जा गृह्णाम्यक्षितम्मयि गृह्णाम्यक्षितम् ॥


स्वर रहित पद पाठ

यावतीऽइति यावती। द्यावापृथिवीऽइति द्यावापृथिवी। यावत्। च। सप्त। सिन्धवः। वितस्थिरे इति विऽतस्थिरे॥ तावन्तम्। इन्द्र। ते। ग्रहम्। ऊर्जा। गृह्णामि। अक्षितम्। मयि। गृह्णामि। अक्षितम्॥२६॥

 यजुर्वेद - अध्याय  38 मन्त्र  26


पदार्थ -
हे (इन्द्र) विद्युत् के समान वर्त्तमान परमेश्वर! (ते) आपकी (यावती) जितनी (द्यावापृथिवी) सूर्य-भूमि (च) और (यावत्) जितने बड़े (सप्त) (सिन्धवः) सात समुद्र (वितस्थिरे) विशेषकर स्थित हैं, (तावन्तम्) उतने (अक्षितम्) नाशरहित (ग्रहम्) ग्रहण के साधनरूप सामर्थ्य को (ऊर्जा) बल के साथ मैं (गृह्णामि) स्वीकार करता तथा उतने (अक्षितम्) नाशरहित सामर्थ्य को मैं (मयि) अपने में (गृह्णामि) ग्रहण करता हूं॥२६॥

भावार्थ - विद्वानों को योग्य है कि जहाँ तक हो सके, वहां तक पृथिवी और बिजुली आदि के गुणों को ग्रहण कर अक्षय सुख को प्राप्त होवें॥२६॥

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